एक दिन बस युहीं नज़र पड़ गई।
वो औरोतों के कमर के बल की तरह इठलाती,
मटकती कहीं चली जा रही थी।
दोनों हाथों से सब्जबाग के ओस को चुनती,
कभी-कभी तो गेहूं-धान के कुछ टुकरे भी हाथों में आ जाते,
और तो और बदमाशियों में तो भुट्टे भी चुरा लेती है,
यकीं ना आये तो फ़ेके हुए भुट्टों पे दांत के निशां देखो,
और फिर मुस्कुरा के चल देती,
और ऐसे चलती है की पास के स्टेशन पे ट्रेन पकडनी है,
मैंने गौर किया,
थकती नही है,बारहों महीने बस चलती रहती है,अपने हीं धुन मे,
और वो औरोत वाली बात,
यकीं नहीं तो छु कर देखो,
लगता है जैसे पाउडर का पूरा डब्बा चेहरे पे लगा लिया हो।
बरसात में हीं आँखें खोलती है,
तब उसकी आँखों में आँखे डाल कर देखो,
उसके सपने...
यकीं ना आये तो खरीफ़ से पूछो,
सपनो को सपनो से बतीयाते देखा है कभी।
फिर वो साल में एक बार बूढ़ी-बूढ़ी सी भी दिखती है,
शायद वो कोल्ड-क्रीम नही लगाती,
चेहरे पे नाखूनों के निशान,
यकीं नहीं तो पूछ लो,
गर्मियों में इसके सिवा की दूसरी के चेहरे ख़ुश्क हुए है?
चलती हीं रहती है,
नदियों सी,
रस्ते बनाते,
सिखाते,
कि मंजिल दिखती नही,
तो पास नहीं है ऐसा भी नहीं है।
यकीं नहीं आता तो देख लो,
कुछ एक पगडंडी हाथों पे भी है...

1 comment:
Waah! Bahut khub aur kya umda khayaalon k saath likha!!
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