Saturday, April 6, 2013

अपराध और दंड

crime and punishment 

आज फिर नींद नहीं आ रही है,रोज-रोज की नींद से बोरियत हो गई है शायद। वैसा तो कुछ भी नही हुआ । खालीपन है,तो सब को है । 
[लेकिन मुझे लगता है की मेरे तमाम असफलताओ का अपराधी मैं खुद को मानता हूँ और खुद को दंड देने की अभिलाषा भी होती है]

चेतना का संचार रुक गया है शायद । खुश्क,शुष्क,कोरी आँखों के किनारों कि दहलीज,कुछ प्रतिपल ढूँढती  रहती है और मैं  पुतली की तरह बस अपने आँखों के दायरे में सिमित हूँ ।  
जटिल है,प्रहारशील है,उन्मुक्त भी है किन्तु क्षितिज पे बन्धी है,जिंदगी है। 

समझ नहीं पा  रहा की शस्त्रीकरण जरुरी है या आत्ममंथन । जनता हूँ की ब्रह्माण्ड हर पल विकसित हो रहा है परन्तु मुझे क्यों लग रहा है की सब सिमट रहा है?

ये अपनी जगह सही है,वो अपनी जगह सही है,जब सब अपनी जगह सही है तो फिर या तो मैं  गलत हूँ या फिर  मैं भी सही हूँ,इसका फैसला कौन करेगा?सब के सही हो जाने पर मुझे संसार की व्यवस्था पे संदेह हो जायेगा। अंतस से उठता और विचलित करने वाला और मूल में अंकित,अति सूक्ष्मरूप से मानसिक और स्मृती पे प्रश्नचिन्ह,संसार का परिवेश ही बदल जायेगा ।मेरा स्वयं का परिवेश और मनोस्थिति भी। और फिर तो अवसाद से ग्रसित होने का सारा कारण ही ख़त्म हो जायेगा। फिर किससे लडूंगा ? फिर जीने का लक्ष्य  क्या तय करूँगा?फिर क्या करूँगा?बिना लक्ष्य के जीने का क्या औचित्य ?

संसार तो स्वार्थी है । स्वार्थी तो मैं भी हूँ । स्वार्थी तो सब हैं। ऐसे तो मैं घिर गया। संदेह हो रहा है स्वयं पर,ये आज क्यों मुझे संसार की सारी बातें सही क्यों लग रही हैं?अब ये दयित्व मैं  अपने उपर लेता हूँ,अपने उपर बीतने वाली हर बात का दायित्व । आत्मचिंतन और मनोबोध दोनों का पारस्परिक असमंजस,विकार का भाव,मैं स्वयं को दोषी नहीं मानता और अपराधबोध भी हो रहा है । 

*मैं रस्कोलनिकोव और सोन्या के दृष्टिकोण  से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ ।  


 

Sunday, January 20, 2013

Pagdandi


एक दिन बस युहीं नज़र पड़ गई।
वो औरोतों के कमर के बल की तरह इठलाती,
मटकती कहीं चली जा रही थी।
दोनों हाथों से सब्जबाग के ओस को चुनती, 
कभी-कभी तो गेहूं-धान के कुछ टुकरे भी हाथों में आ जाते, 
और तो और बदमाशियों में तो भुट्टे भी चुरा लेती है,
यकीं ना आये तो फ़ेके हुए भुट्टों पे दांत के निशां देखो,
और फिर मुस्कुरा के चल देती, 
और ऐसे चलती है की पास के  स्टेशन पे ट्रेन पकडनी है, 

मैंने गौर किया,
थकती नही है,बारहों महीने बस चलती रहती है,अपने हीं धुन मे,
और वो औरोत वाली बात,
यकीं नहीं तो छु कर देखो,
लगता है जैसे पाउडर का पूरा डब्बा चेहरे पे लगा लिया हो।

बरसात में हीं आँखें खोलती है, 
तब उसकी आँखों में आँखे डाल कर देखो,
उसके सपने...
यकीं ना आये तो खरीफ़ से पूछो,
सपनो को सपनो से बतीयाते देखा है कभी।

फिर वो साल में एक बार बूढ़ी-बूढ़ी सी भी दिखती है,
शायद वो कोल्ड-क्रीम नही लगाती,
चेहरे पे नाखूनों के निशान,
यकीं नहीं तो पूछ लो,
गर्मियों में इसके सिवा की दूसरी के चेहरे ख़ुश्क हुए है?

चलती हीं रहती है,
नदियों सी,
रस्ते बनाते,
सिखाते,
कि मंजिल दिखती नही,
तो पास नहीं है ऐसा भी नहीं है।

यकीं नहीं आता तो देख लो,
कुछ एक पगडंडी हाथों पे भी है...

Monday, October 29, 2012


                                               भोकाल 


(एक रूम है,खिड़की खुली हुई है,सुबह होने वाली है,स्ट्रीट लईट जल रही है,रूम में ढेर सारी किताब बिखरी हुई है,कपडा इधर-उधर फेंका हुआ है, सिगरेट का बड ज़मीन पे फेका हुआ है,२-४ कप रखी हुई है और घड़ी में ४ बज रहा है|)
[एक आदमी पूरी नींद में सो रहा है...इतनी नींद में की जैसे मर गया हो.
तभी वहां यमराज प्रकट होते है और उस आदमी को उठाते है|]

यम-उठो बालक,तुम्हारा समाये पूरा हुआ|
(आदमी नींद में मुह चलाता है और सोया हीं रहता है,)
यम-बालक...बालक...उठो अब तुम्हारे जीवन का समय समाप्त हुआ|
(आदमी फिर भी नही उठता)
यम(गुस्से में )-उठो sss   (खूब जोर से )
यम उसके चेहरे पे पानी गिरता है...
आदमी गुस्से से उठता है,बहुत  गुस्से से यम को देखता है और पूछता है -कौन  हो तुम?
यम-हम  काल हैं........
आदमी उसी गुस्से में-तो हम "भोकाल" है....

Wednesday, June 27, 2012

                                             "सिनेमा","समाज" और "बगल वाला चाँद" 

"एक बगल में चाँद होगा एक बगल में रोटियाँ" बस ये एक गाना अपने आप में सब कुछ कह देता है|मेरे हिसाब से सिनेमा एक तो वो बनानी चाहिए जिसकी आपको समझ हो और दूसरी उनके लिए बने चाहिए जो आपको समझे और अनुराग कश्यप की इन दोनों चीजों में पकड़ हैं|शुरू होते हीं ये सिनेमा आपको मोजुदगी का अहसास करा देती है|इससमे यतार्थ है,सामाजिक परिवेश में बुन के इससे बड़ी हीं सादगी और कुशलता से फिल्माया गया है| एक छोटे से गावँ के इर्द-गिर्द बड़ी हीं सुंदर रचना की गई है और इस के लिए ज़ीशान कादरी,अखिलेश,सचिन लडिया और अनुराग की प्रशंसा करनी चाहिए|

फिल्म की कहानी पूरी तरह से बदले पे केन्द्रित की गई है,परन्तु इसमे वो नो रस मजूद हैं जिनसे मनुष्य की रचना की गई है और हर एक पात्र काफी शाश्क्त और मजबूत है|अगर  बात कहानी की की जाये तो मेरे समझ से कहीं भी कमज़ोर कड़ी नही दिखती,लेकिन ये कुछ तेज़ भी है और धीमी भी,वजह शायद इसको २ खंडो में दिखानी है|पात्रों के अदाकायरी की बात की जाये  तो सभी ने अभिनय काफी अच्छी की और खास तौर पे मनोज बाजपाई ने बड़ी हीं खूबसूरती के साथ अपने हुनर को अंजाम दिया है,बस एक बात समझ नही आया की तिग्मांशु धुलिया को  रामधीर सिंह जैसे किरदार में क्यों लिया,खैर ये बात तो बंटी भैया हीं बता सकते हैं|फिल्मांकन की बात की जाये तो हर एक दृश्य बड़ी हीं सत्यता का अहसास कराती है,वही खेत,वही गलियां,वही घर,चापाकल और लोटा|दृश्य कसाई बाज़ार का हो या जेल का बड़ी हीं सहज लगती है|निर्देशन की बात की जाये तो कहना होगा की एक कसी हुई स्क्रिप्ट को किस तरह परदे पे उतरा जाता है ये कोई अनुराग से सीखे|काफी सही,स्पस्ट और दृश्य के मुताबिक संवाद रखे गए हैं,कहीं भी ये नही लगता की संवाद गैर-ज़रूरी थे या बवाल खडी करने के लिए डाले गए थे|संगीत तो जैसे मिटटी की खुश्बू आज तक किसी ने ऐसी नही सुंघाई थी|स्नेहा खानवलकर को इस के लिए ढ़ेरों शुभकामनाये|वरुण ग्रोवर के लिखे हुए गाने उनको काफी समझदार गीतकार के  श्रेणी में ला के खड़ा कर देती है|

अब बात करते हैं कुछ अनकहे चीजों पे,जैसे सरदार खान का बच्चे पैदा करना और कहना की ये उपर वाले की दें है उसकी  मानसिकता या कह सकते हैं उस समुदाय की मानसिकता को उस परिवेश में दिखाता है|बहार जीत का जश्न मनाता सरदार खान और उसका  रोता बच्चा एक अनुचित संतुलन बनता है,बच्चो का ice-cream खाने का तरीका काफी हद्द तक मज़ेदार था और ऐसा होता भी था|सिनेमा हॉल के टोर्च-मेन से सिनेमा देखने की जिद्द करती हुई लड़की,पहली बार बन्दूक हाथ में ले कर किसी फिल्म के हीरो की तरह गोली चलने वाला फैज़ल ये सब जैसे कोई पानी  से चुन-चुन के सितारा उठा रहा हो|

अब कुछ समाज पे चर्चा की जाये तो ये फिल्म कैनंस में प्रदर्शित हुई और हमरे मजबूत सोच और फिल्म का उद्धरण बने और दुनिया को बताया की हम सिर्फ NRI और पैसे कमाने के लिए हीं फिल्म नही बनाते|ये हमारे बदलते सोच की गहरी छाप छोड़ने में सफल रही|सिर्फ फ्रांस,इंग्लैंड या अमेरिका में हीं नही पूरी दुनिया में एक अमिट छाप छोरता है और बड़े हीं शान से बताता है की अनुराग इस बदलते हिंदी फिल्म इन्दुस्ट्री का अगुआ है और ऐसी फिल्मे आती भी रहेंगी और मनोरंजन के साथ एक सोच को भी प्रदर्शित करेंगी|

और अंत में पियूष मिश्र की लिखी हुई और गाइ गई गाने की चाँद पंक्तियाँ
इक  बगल  में  चाँद  होगा , इक  बगल  में  रोटियाँ  
इक  बगल  में  चाँद  होगा , इक  बगल  में  रोटियाँ  
इक  बगल में  नींद  होगी , इक  बगल  में लोरियां 
हम चाँद  पे , हम  चाँद  पे , 
रोटी  की  चादर  दाल  के  सो  जायेंगे | 

Friday, October 1, 2010

Metaphor

Metaphor


Metaphor

metaphor

Pronunciation:/ˈmɛtəfə, -fɔː/

noun

a figure of speech in which a word or phrase is applied to an object or action to which it is not literally applicable:when we speak of gene maps and gene mapping, we use a cartographic metaphor [mass noun] :her poetry depends on suggestion and metaphor

a thing regarded as representative or symbolic of something else:the amounts of money being lost by the company were enough to make it a metaphor for an industry that was teetering

Derivative


metaphoric
Pronunciation:/-ˈfɒrɪk/
adjective

Monday, December 28, 2009

Movie regected....

My first mvie got rejected...by passion for cinema......it was heart breaking.....

It was an another nail for the completion of my bad luck...

Hope nxt tym i'll do smthing that will make my lyf...

Saturday, October 25, 2008

FESTIVAL

The chatt puja is on the way.................
A festival which brings peace....love...harmony......and positive energy .
Lets bang..............





The Last LAIR


A new execution on sachin.......
ON the "MONKEYGATE" hearing GILLY was questioning sachin's honesty.I think he must be in Sydney while writing his autobiography.
Now he said "OUT OF CONTEXT"
Be careful before you sign your autograph.

Sence is not Sensible


Now a days market chrashes more than Mig.FM says we csn hold the liquidity.IS it so.......?
I think THE BULL is not seeing THE RED.

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