crime and punishment
आज फिर नींद नहीं आ रही है,रोज-रोज की नींद से बोरियत हो गई है शायद। वैसा तो कुछ भी नही हुआ । खालीपन है,तो सब को है ।
[लेकिन मुझे लगता है की मेरे तमाम असफलताओ का अपराधी मैं खुद को मानता हूँ और खुद को दंड देने की अभिलाषा भी होती है]
चेतना का संचार रुक गया है शायद । खुश्क,शुष्क,कोरी आँखों के किनारों कि दहलीज,कुछ प्रतिपल ढूँढती रहती है और मैं पुतली की तरह बस अपने आँखों के दायरे में सिमित हूँ ।
जटिल है,प्रहारशील है,उन्मुक्त भी है किन्तु क्षितिज पे बन्धी है,जिंदगी है।
समझ नहीं पा रहा की शस्त्रीकरण जरुरी है या आत्ममंथन । जनता हूँ की ब्रह्माण्ड हर पल विकसित हो रहा है परन्तु मुझे क्यों लग रहा है की सब सिमट रहा है?
ये अपनी जगह सही है,वो अपनी जगह सही है,जब सब अपनी जगह सही है तो फिर या तो मैं गलत हूँ या फिर मैं भी सही हूँ,इसका फैसला कौन करेगा?सब के सही हो जाने पर मुझे संसार की व्यवस्था पे संदेह हो जायेगा। अंतस से उठता और विचलित करने वाला और मूल में अंकित,अति सूक्ष्मरूप से मानसिक और स्मृती पे प्रश्नचिन्ह,संसार का परिवेश ही बदल जायेगा ।मेरा स्वयं का परिवेश और मनोस्थिति भी। और फिर तो अवसाद से ग्रसित होने का सारा कारण ही ख़त्म हो जायेगा। फिर किससे लडूंगा ? फिर जीने का लक्ष्य क्या तय करूँगा?फिर क्या करूँगा?बिना लक्ष्य के जीने का क्या औचित्य ?
संसार तो स्वार्थी है । स्वार्थी तो मैं भी हूँ । स्वार्थी तो सब हैं। ऐसे तो मैं घिर गया। संदेह हो रहा है स्वयं पर,ये आज क्यों मुझे संसार की सारी बातें सही क्यों लग रही हैं?अब ये दयित्व मैं अपने उपर लेता हूँ,अपने उपर बीतने वाली हर बात का दायित्व । आत्मचिंतन और मनोबोध दोनों का पारस्परिक असमंजस,विकार का भाव,मैं स्वयं को दोषी नहीं मानता और अपराधबोध भी हो रहा है ।
*मैं रस्कोलनिकोव और सोन्या के दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ ।

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